रचनाकार : सुशीला तिवारी, पश्चिम गांव, रायबरेली
अम्मा जी
अब बस ,
एक अनुभूति ,,,,,,
तेरे न होने का गम
मां अगर तू होती तो बस वही तेरी आवाज की खुशी महसूस करती ,और मेरी खुशी कई गुना बढ़ जाती।
जिस तरह खुशी को अभिव्यक्त करने के लिए शब्द नहीं होते उसी तरह दुख की भी भाषा खामोशी ही होती है। मैं खामोशी से इन हालातों से गुजर रही हूँ ।
बिना किसी से कुछ कहे।
बहुत सारी बातें तुझे कहनी नहीं पड़ती थी। तू खुद ही समझ जाती थी। मेरी आवाज सुनकर तुरंत कहती ….
तू ठीक है ना?
मेरे लाख मना करने के बावजूद भी मेरा झूठ पकड़ लेती और एक लंबी सांस लेकर धीरे से कहती ….फिर चली आना
कुछ पल की खामोशी के बाद मैं बोलती..
अच्छा ,,,,,,ठीक है !
सच है एक माँ ही खामोशी को पढ़ सकती है ।अब ऐसे मौके कभी नहीं आएँगे। यादें तो अनगिनत है और बेझिझक चली आती है ।
मुझे अच्छी तरह याद है जब बीमार अवस्था में देखने गई थी
चलते वक्त आँख में आंसू भर कर कहा !
अब कब आओगी ?
मैंने कहा जल्दी आऊंगी पर नही जा पाई
खाने की कोई भी चीज अपनी पसंद की बनवा कर खाना अब कभी नहीं ।
तू तो अपने स्वाभिमान की सीढ़ी से खुद ही मोक्ष को प्राप्त हो गई ।
बस खुद ही करती रही सबके साथ निस्वार्थ भाव ,
इस बात का बहुत दुख रहता है ।कभी तो हमने भी तुझे कहा होता “लव यू अम्मा”पर आज बोल रही हूँ ।
बहुत बहुत ज्यादा हम सब तुझे प्यार करते हैं।
लव यू अम्मा !
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फर्ज
जी हाँ
आज के इस बदलते परिवेश में आधुनिकता की अंधी दौड़ चल रही है, आधुनिकता की दौड़ में नैतिकता और सामाजिक कर्तव्यों से भटकाव इस दौड़ में सब अपने आप को सबसे आगे नही तो बराबर जरूर पाना चाहता है ।
और शायद इसी में आज की युवा पीढ़ी ही नही बल्कि हर उम्र का व्यक्ति उलझकर रह गया है और अपना फर्ज निभाने के लिए वक्त नही है।
मैं तो कहीं न कहीं इस के लिए व्यक्ति को स्वयं भी जिम्मेदार मानती हूँ, आधुनिकताके नाम पर संस्कार हीन फैशन अपनाना,
जिसमें हर कोई उलझ कर रह गया है ,हर कार्य में जल्दबाजी नैतिक दायित्वों से विमुख करता है। अपने फर्ज के प्रति वफादार न होकर भटक गया है।
सवाल ये उठता है, कि फर्ज के प्रति जागरूक हो जाये सब पर सही दिशा निर्देश कौन दे ।
सभी तो अंधी दौड़ में शामिल है
इसलिए फर्ज से भटकती राहों का जिम्मेदार
व्यक्ति स्वयं, और समाज, फिल्मी फैशन, तकनीक,भौतिक सुख सुविधा।
जिम्मेदार कौन है!
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समझदारी
जी हाँ
आज के इस आधुनिकता की तरफ बढ़ रहे युग में बदलते मौसम और साल की तरह परिस्थित के अनुसार बदल जाना ही समझदारी है ।
क्योंकि नयी पीढ़ी अपनी नयी सोंच और नये ढंग के साथ नयी दिशा में चलना चाहता है, आपके विरोध करने पर टकराव की स्थिति उत्पन्न होगी, जो कि वो
आपके लिए तकलीफदेह होगी ।
परिवार के साथ खुश रहने में ही भलाई और समझदारी है, सामने वाले को हम नही बदल सकते
पर खुद बदल जाना तो अपने वश में है ।
बदलती परिस्थितियों के साथ अपने आप में बदल जाना ही सही है ,बदलाव प्रकृति का भी शाश्वत नियम है
अत: बदलिये अपनी आदत, अपना व्यहवार पर अपने व्यक्तित्व को नही
बदलिये ,अपने को उतना ही जितने में आपका आत्मसम्मान बना रहे ।
आपका व्यक्तित्व ही आपकी पहचान है,
बदलिये, पर मौकापरस्ती नही!