रचनाकार : शबनम मेहरोत्रा, कानपुर
फागुन की बयार
कुछ ज्यादा ही खो गई साजन तेरे प्यार में
कुछ तो असर हुआ ही है फागुन की बयार में
सास ससुर देवर ननदी से
घर भरा है पूरा
पर साजन परदेश गए है
जीवन लगता अधूरा
उन बिन आग लगी है मेरे चैन और करार में,,,,,
होली भी नजदीक आ गई
सजना किए है फोन
न जाने किस दिन आयेंगे
जानूँ न दिन कौन
उनके बिना ऐसा लगता है कोई नही संसार में,,,,,
सबसे पहले मुझको रंगते
काला पीला लाल
ताकि कोई दूसरा पाए न
रंगने मेरे गाल
प्यार बहुत आता है शबनम उनसे बहुत तकरार में
कुछ तो असर हुआ ही है फागुन की बयार में
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बसंत
मन में उठी उमंग , भीतर जगा बसंत
फागुन की रातें रसवन्ती, दिन भी है रसवंत
खिली टेसू की पंखुड़ी , मिल के बनाओ रंग
होली में क्या प्रतिबंध , मुझे लगा लो अंग
अंबुआ पर छाई बहार, की उठे कचनार
पांव की झांझर बज उठी ,नैन भए रतनार
ख़ुश्बू कहीं अबीर की , कहीं गुलाल के रंग
हवा बसंती बौराईं , पी संग पीली भंग
पिया लगाए तन ,फागुन फगुनाई के संग
भूल के मन ये बावरा ,लग गया पी के अंग
होली की टोली , रातों में गाए मिलन के गान
पी की बाँह में सिमटी जाए , शबनम के तन प्राण
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पलाश (टेसू) के फूल
कुदरत का देखिए कैसा वसूल है
डालियों में पत्ते नहीं फूल फूल है
रसायनिक रंगो के प्रचलन हो रहा
टेसू रंग अब नही होता कबूल है
त्योहार भी अब शिष्टाचार होने लगा
कीचड़ और मिट्टी कहा अब धूल है
दिल में डर पाले हो अपनी दुष्णमी
होली का त्योहार नही तेरी भूल है
शबनम नहीं दिखावा है प्यार में मेरा
इसके लिए कुर्बान मेरा जीस्त समूल है
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होली
मेरे सैया है लत से लाचार , परेशान करे होली में
हम पर करते है रंग का बौछार , परेशान करे होली में
गाँव की सुंदर , बाला न भाए
कौनों भोजाई के , रंग न लगाए
मुझको बोले कली कचनार , परेशान करे होली में
मित्रों से भी , दूर रहे वो
मेरे नशे में , चूर रहे वो
मैं तो उनसे गई हूँ हार , परेशान करे होली में
कोई देवरवा के , आवन न दे
मुझको होली , खेलन न दे
ऐसी लत से शबनम को प्यार , परेशान करे होली में