अखंडानंद ने शांत स्वर में कहा — बेटा! बाबा नहीं चाहते कि उनके पूजा—पाठ में कोई विघ्न पड़े। अत: हम लोग सुनसान इलाके में ही नोटों की बारिश कराते हैं। इस अनुष्ठान की विधि छोटी सी है। इसे करने से एक दिन पहले तुम्हें पत्नी समेत आमों के बाग में जाकर शाम को पेड़ की पूजा करनी होगी। चौथे दिन हम तुम्हारे लिए यह खास अनुष्ठान करेंगे। अनुष्ठान पूरा होने के बाद तुम्हें करीब पांच लाख रुपये मिलेंगे। उन्हें घर में रखना या बैग आदि में भरकर लाना दिल्ली जैसे शहर में सुरक्षित नहीं होगा। तुम तो बस अनुष्ठान पूरा होते ही नोटों की बारिश से इकट्ठे हुए नोट स्कूटर की डिग्गी में डालकर ले जाना और बैंक में जमा करा देना! मां कंकाली की कृपा बरसेगी तो सब कष्ट दूर हो जाएंगे।
मुकुल व रूपेश — ठीक है! जैसा आप चाहे। जय कंकाली माता! जय बंगाली बाबा! उनकी बातों से संतुष्ट होकर मुकुल व रूपेश जयकारे लगाते हुए अपने—अपने घरों में वापस लौट गए!
रात में अपने पति को चिंतित देखकर सौम्या से रहा नहीं गया। वह पूछ बैठी — ऐजी क्या हुआ? मूड कुछ उखड़ा—उखड़ा नजर आ रहा है?
मुकुल परेशानी भरे स्वर में बोला— सौम्या! बाबा नोटों की बारिश तो करा देंगे पर पूजा—पाठ के लिए 11 हजार रुपये का इंतजाम कहां से होगा, समझ मे नहीं आ रहा। अभी तो सैलरी मिलने में भी पूरे बीस दिन हैं। इससे पहले रश्मि की फीस भी भरनी है।
सौम्या — बस, इतनी सी बात?
मुकुल ने हैरानी से पूछा — क्यों तुम्हारे पास क्या कोई खजाना गड़ा हुआ है?
सौम्या — नहीं कुछ नहीं! मैं सोच रही थी कि मैं तुम्हें अपना सोने का एक हार दे देती हूं। तुम इसे सेठ दमड़ीलाल के यहां गिरवी रखकर जरूरी रकम उधार ले लो। नोटों की बारिश के बाद जो रकम अपने पास होगी उससे सब कर्ज आदि चुका कर हमलोग ठाठ से जिंदगी जिएंगे।
मुकुल को लगा कि इस स्थिति में सौम्या का कहना मानना ही ठीक होगा। वह अगले दिन उससे सोने का हार लेकर सेठ के पास गिरवी रखने पहुंच गया।
जब मुकुल सेठ के पास पहुंचा तो वहां देखा कि सिटी न्यूज अखबार का रिपोर्टर कमाल रस्तोगी भी बैठा हुआ है। कमाल रस्तोगी अपनी बेबाक रिपोर्टिंग के कारण पूरे इलाके में मशहूर था। मुकुल ने सेठ व रस्तोगी को नमस्कार किया और सेठ से हार के एवज में 15 हजार रुपये उधार मांगे।
सेठ ने कहा — वो तो ठीक है, मुकुल! पैसे तो तुम्हें मिल जाएंगे। तुम्हें मेरी उधारी तीन साल में चुकानी होगी वो भी 12 प्रतिशत हर साल चक्रवृद्धि ब्याज के साथ। पर ये तो बताओ, उधार किसलिए ले रहे हो?
उनका सवाल सुनकर मुकुल कुछ सकपकाया और नजरें नीची करके बोला— बस, ऐसे ही जरूरत पड़ गई थी। आप चिंता मत करो, आपके पैसे हो सकता है तीन साल के बजाय तीन दिन में ही मिल जाएं।
यह सुनकर रस्तोगी और सेठ दोनों हैरान रह गए। रस्तोगी ने भांप लिया कि मुकुल कुछ छिपा रहा है। वह मानता था कि जो छिपाया जाता है, वही असली खबर होती है। अत: वह मुकुल को उधारी की रकम मिलने के बाद पीछे लग गया। जल्द ही उसने जैसे—तैसे पता लगा ही लिया कि मुकुल बंगाली बाबा के चक्कर में पड़कर नोटों की बारिश कराने के लिए यह रकम उधार ले गया है।
चौथे दिन — दोपहर में रसूलनबाई के बाग में होगी नोटों की बारिश! ये सब माजरा जानकर रस्तोगी बाग में हो रही गतिविधियों पर गुपचुप रूप से नजर रखने लगा। तीसरे दिन मुकुल अपनी पत्नी के साथ आमों के बाग में पेड़ों की पूजा करने गया। पूजा करते समय उन्हें ऐसा लग रहा था मानो उनकी गरीबी अगले पल ही दूर होने वाली हो।
चौथे दिन मुकुल घर से भगवान को हाथ जोड़कर और सौम्या के हाथ से थोड़ा दही—चावल खाकर रूपेश के साथ स्कूटर पर बैठकर रसूलनबाई के बाग में पहुंच गया। वहां बाबा अपने चेले अखंडानंद के साथ पहले से ही मौजूद थे। दोपहर में ठीक 12 बजे बाबा ने नोटों की बारिश के लिए पूजा—पाठ शुरू किया। मुकुल व रूपेश श्रद्धावनत होकर बाबा की कही बातें मानते जा रहे थे। कुछ देर कभी उंची तो कभी नीची आवाज में मंत्र आदि पढ़ने के बाद बाबा ने हवन की व्यवस्था की और तरह—तरह की आवाजें निकालते हुए यज्ञवेदी में आहुतियां देने लगे। आहुतियों के धुएं से मुकुल व रूपेश की आंखों में आंसू आ गए। वे सम्मोहित सा होकर सारा अनुष्ठान देखे जा रहे थे। अचानक बाबा उठ खड़े हुए और जोर से बोले ।
क्रमशः