शबनम मेहरोत्रा, कानपुर
दुर्गम पथ पर
हे प्रिय ! बोलो दुर्गंम पथ पर,
कैसे अपना गीत लिंखूँ।
अधरों पर बीते लम्हों की,
कैसे प्रीत प्रतीत लिखूँ।
जब कोई भी मीत नहीं है।
साँसों में संगीत नहीं है।
फिर धड़कन में किसको घोलूँ,
मथकर क्या नवनीत लिखूँ।,
हे प्रिय कैसे गीत लिखूँ।
दहक रहे दिन सूनीं रातें
सिसक रहे पल आते जाते।
सुबह शाम बस सुमिरन करती,
क्या अपनों की रीत लिखूँ।
हे प्रिय कैसे गीत लिखूँ।
पवन हिलोरें नित भरती हैं,
किन्तु निराशाएँ पलती हैं।
तमस छल रहा आज उजाले,
आते यादों के हिचकोले।
रवि किरणों ने छला मुझे है,
मैं विरहन क्या प्रीत लिखूँ,
हे प्रिय कैसे गीत लिंखूँ?
काल सर्प ज्यों अंध गुफा में लंबा मुंह फैलाए है
पल पल जीवन को छलता है काल रूप अपनाए है
स्वप्न झील में पलते मोती प्रात: नयन में अश्क हुए।
सजल वेदनाओं की सिहरन,
ओस बूँद में अश्क हुए।
कैसे पीडापथ पर चलकर
नेक नियति की नीत लिखूँ।
हे प्रिय कैसे गीत लिखूँ।
अंतर्घट में गरल पल रहा,
करता मन के घाव हरे।
पीपल की कोमल किसलय में,
आतप का है भाव झरे।
आनन्दित हो प्राण पखेरू
कैसे निरुपम प्रीत लिखूँ।
पड़ें सुधारस के कुछ छींटे,
हे प्रिय! कैसे गीत लिखूँ।
श्रम साफल्य बने जीवन में,
लक्ष्य मिल सके मन चेतन में,
फिर आ जाए बासन्ती रुत,
छा जाए रंगीन फ़िज़ाएँ
जो अपना मन मीत लिखूँ।
हे प्रिय ! कैसे गीत लिखूँ।
प्रेम गीत की प्रीत लिखूँ।
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गुनगुनाती रही (ग़ज़ल)
रात ख्वाबों में मैं गुनगुनाती रही
खुद की ऑंखें क्यों जगाती रही
प्यार का रोग ले लिया खुद ही
डोर में वो बंधी कसमसाती रही
तोड़ कर नाते प्यार के खुद सारे
हमारे पीछे फिर क्यों आती रही
सच बयाँ करने को देखिए अपने
गैर के किस्से आज सुनाती रही
वो मेरे चर्चे जुबाँ तक नही लाते
आँख जिसके लिए मैं बहाती रही
जिसने दिल खोल दिया शबनम
उससे हर बात ही मैं छुपाती रही
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