लेखिका: शिखा तैलंग (भोपाल )
जब अपना दर्द सहो, तब दूसरे के दर्द की कीमत समझ आती है!
सारांश :
“तेरा दर्द, मेरा दर्द” – यह एक भावनात्मक पारिवारिक कहानी है जो पति-पत्नी के रिश्ते की गहराई, उपेक्षा, अहसास और समझ पर केंद्रित है। राधा कमर दर्द से परेशान है, लेकिन उसका पति आनंद उसकी तकलीफ को नज़रअंदाज़ करता है। जब एक सड़क दुर्घटना में आनंद को भी वैसा ही दर्द होता है, तब उसे राधा की पीड़ा का सच्चा अहसास होता है। यह घटना दोनों को करीब लाती है और रिश्ते में सहानुभूति की नींव मजबूत करती है। अंत में उनकी छोटी बेटी आशा की मासूम बात सबके चेहरों पर मुस्कान ले आती है।
आइये पति और पत्नी के रिश्ते पर आधारित इस भावनात्मक कहानी को पढ़िए –
चैप्टर-1
मिस्टर आनंद जब एक ही नाव में दो सवारियां बैठी हों, और एक दर्द से परेशान हो तो एक-दूसरे का खयाल करना ही पड़ता है। अन्यथा, यह हो सकता है कि दर्द से परेशान व्यक्ति की हरकतों के कारण नाव डगमगाने लगे और कहीं नाव डूबने का ही खतरा पैदा नहीं हो जाए। अपनी पत्नी राधा के तीखे स्वर में किए गए इस कमेंट्स से उनके पति आनंद यादव के पैरों तले की जमीन खिसक गई।
दरअसल, राधा इतने तीखे स्वर में अपने पति से कुछ कहना नहीं चाहती थी पर उसे कहना पड़ा। वह लगातार तीन दिनों से कमर दर्द से परेशान थी और आनंद उसे डाॅक्टर अनुजा त्रिवेदी के पास दिखाने के लिए नहीं ले जा रहे थे। इन तीन दिनों से राधा जो पीड़ा भोग रही थी, वह आनंद के ढीले-ढाले रवैये के कारण गुस्से में बदल कर निकल पड़ी थी।
आनंद इन तीन दिनों में कभी आफिस के काम का रोना रोकर, तो कभी अपनी नन्हीं बेटी आशा को बाहर घुमाने ले जाने के कारण और कभी खुद के सिर में दर्द होने की बात कहकर राधा को डाॅक्टर के पास ले जाने से बच रहा था। इससे राधा को यह फील होने लगा था कि उसका पति कितना ह्दयहीन है, जो यह तो चाहता है कि राधा उसके लिए रोज नई-नई डिशें बनाती रहे, घर का सारा काम भी संभाले रहे और जरूरत पड़ने पर आनंद की चरण सेवा भी करती रहे। राधा को अपने प्रति आनंद का यही उपेक्षापूर्ण रवैया पसंद नहीं आ रहा था।
इन तीन दिनों में वह कमर के दर्द को काबू में करने के लिए कभी नेट पर सर्च करके घरेलू टोटके आजमाती रही या फिर आयोडेक्स की मालिश करके अपने दैनिक काम-काज जैसे-तैसे निपटाती रही अथवा कभी बहुत परेशानी लगी तो अपनी बेटी से कहकर गरम सिकाई करवा लेती। लेकिन उसका दर्द ऐसा जिद्दी था जो कि काबू में आ ही नहीं रहा था बल्कि समय बीतने के साथ बढ़ता ही जा रहा था।
राधा चाहती थी कि इस दर्द के बहाने कम से कम आनंद उसकी परिस्थिति को समझे। उसके घर के काम-काज में हेल्प कर दे। लेकिन इन तीन दिनों में आनंद ने न केवल राधा से दूरी बनाये रखी बल्कि आर्डर पर आर्डर झाड़कर राधा के सारे मंसूबों पर पानी फेर दिया। राधा को समझ में नहीं आ रहा था कि शादी के पहले हर सुख-दुख में साथ निभाने की कसमें खाने वाला आनंद को विवाह के पांच वर्ष बाद क्या हो गया था, जो कि वह उसके पास फटकना ही नहीं चाह रहा था।
इन पांच वर्षों में उन्होंने कितने पल साथ सुकून के साथ अथवा हंसी-खुशी से बिताए थे, इसका हिसाब-किताब उसके ध्यान ही नहीं आ रहा था। दिमाग पर ज्यादा जोर डाला तो उसे बस यही ध्यान आ रहा था कि आनंद ने पांच वर्ष पहले उसकी कोख में आशा का बीज बोया था। फिर जब आनंद को पता चला कि राधा एक बेटी को जन्म देने वाली है तो वह उससे दूरी बनाकर चलने लगा था।
उसने पिछले चार वर्षों में आनंद से कई बार आशा को लेकर घुमा फिराकर सैकड़ों सवाल किए थे पर आनंद को उनका जवाब देना पसंद नहीं आता था। वह या तो जवाब देने में टालमटोल कर जाता या झुंझला पड़ता था। एक बार तो उसने राधा को मारने के लिए हाथ भी उठा लिया था। राधा समझ नहीं पा रही थी कि आशा के जन्म में उसका क्या कुसूर था?
क्रमशः
(काल्पनिक कहानी).