यशवन्त कोठारी, जयपुर
सहजीविता के कारण विवाह नामक संस्था कमजोर हुई तथा परिवार कल्याण के साधनों के खुले प्रयोग, प्रचार प्रसार से गर्भधारण से लम्बा अवकाश मिलने लगा है। और इस करण भी प्रेम के उपयोग में स्वच्छन्दता आई है।
शिक्षा, सहशिक्षा प्रोफेशनलिज्म तथा एक ही प्रोफेशन में रहने के कारण स्त्री पुरूषों के प्रेम प्रसंगों में बाढ़ सी आ गई है। पिछले कुछ वर्षो में लड़कियों युवतियों महिलाओं के जीवन के हर क्षेत्र में प्रवेश के कारण उनमें आत्मविश्वास बढ़ा है। और यह आत्मविश्वास प्रेम सम्बन्धों में भी देखा जा सकता है। प्रणय निवेदन और प्रपोज करना अब पुरूषों का एकाधिकार नहीे रह गया है।
आपसी उदारता बच्चों में भी आती है। और दादादादी नाना नानी भी अब उदार और सहनशील हो गये है ऐसे उदाहरणों की कमी नहींे जहां पर दादा दादी, नाना नानी, ने प्रेम पं्रसंगों केा संभालने में योगदान किया है अनुभव की नूतनता की आवश्यकता हर एक को पडती है। इस कारण नई पीढी नये नये प्रयोग करती है।
प्रेम विवाह, प्रणय याचना, यात्रा, पिकनिक, नये मित्र मन बहलाव मनोरंजन के नये नये साधन ढूढ लाते है और इन सब का एक सिरा प्रेम हैंे तो दूसरा सिरा प्रसंग। इन सबमें व्यक्ति का शारिरिक रूप बहुत महत्वपूर्ण होता हैं। शारिरिक आर्कषण से व्यक्ति में उर्जा अधिक होती है। और इस कारण वो प्रतिभावान आशावान और खुश रहता है।
प्राचीन साहित्य में भी प्रेम एक महत्वपूर्ण विषय हमेशा से रहा है। संस्कृत, उर्दू साहित्य में प्रेम प्रसंगों के विवरण है। और श्रृंगार को बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है एक ही सच्चे प्रेम के किस्से हर तरफ सुने जा सकते है। सम्पूर्ण प्रेम के लिए त्याग करने वाले हर युग में हुए है।
प्रसंग काम के लिए क्रीडा एक अनिवार्य आवश्यकता के रूप में उभर कर सामने आई है। सभी धर्माें में वंशवृद्धि के रूप में इसे एक उद्दात्त कर्तव्य माना गया है। प्रसंग में व्यक्ति के मूल्य निजि ढंग से होते है और समाज के मूल्य भी इसमें शामिल होते है।
दैव लोक एलिस ने स्त्रियों के स्वतंत्रता अस्तित्व की वकालत को एक स्वरूप ऐन्द्रिय सुख माना जाने लगा है। संक्रमण करने में प्रसंग को वर्जित मानने वाले अब समाज में बहुत कम रह गये है। स्त्रीत्व की तलाश में भटकने की परमावश्यकता नहीं है। स्त्री जागरूकता के कारण शिक्षा के कारण अब और स्वयं को अतिजागरूक समझने लगी है। प्रेम के मामलें स्त्री पुरूष से आगे निकलने की प्रक्रियां में यात्रा कर रही है शिक्षा का रोल इस सम्पूर्ण क्रम में बहुत महत्वपूर्ण है। धीरे धीरे स्त्री अपने प्रंेम जीवन को समझ रही हैं।
प्रसंग के काम में उल्लेखनीय है कि सामाजिक रूप से स्वीकृत मापदण्ड ही नैतिकता के रूप में प्रचारित पसारित किये जाते है। भारतीय समाज में परमावश्यक प्रभाव बहुत प्रबल होता है और इन्हीं परमपराओे के आधार पर नैतिक मान्यताओं का विकास हुआ हे। जिससे रूढिवादी समाज कढोरता से और प्रगतिशील समाज भी स्वीकार करता है। ये प्रतिमान प्राचीन भानत में भी उपलब्ध थे। प्रेम और प्रसंग की आवश्यकता अलग अलग हो सकती है। मगर समाज में स्वीकृति एक की होती है।
(क्रमश:)
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