यशवन्त कोठारी, जयपुर
विवाह पूर्व सम्बन्ध, विवाहेत्तर सम्बन्धों के प्रति भी एक खुलापन सर्वत्र दिखाई दे रहा है। विवाह के साथ साथ रहने की प्रवृति का भी विकास है। जो समाज को परिवर्तित करने की ओर अग्रसर है प्रसंग संतुष्टि नहीं होने पर अन्य सम्बन्धों को जायज ठहराया जाता है। क्यों कि समाज में आज भी प्रतिबन्ध स्त्रियों पर ज्यादा है और पुरूषों पर कम। धीरे धीरे समाज में प्रसंग के मायने में स्वतंत्रता, स्वीकृति और सहिष्णुता का विकास हो रहा है। जो एक नये उभरते हुए समाज का ध्योतक है हर व्यक्ति यह निर्णय करने को स्वतंत्र है कि उसके लिए सही क्या है और गलत क्या है। और जो उसे सही लगता है उसे करने की स्वतंत्रता व्यक्ति को मिलनी ही चाहिये।
आज जागरूकता के कारण स्त्री को प्रसंग शब्दावली में रूचि उत्पन्न हो गई है। और वो अपने पार्टनर से यह सब चाहती है आज की स्त्री विविध प्रकार के काम व्यवहार को स्वीकार करती है। उसमें सक्रिय भाग लेती है। और आक्रामक हो सकती है वे पूरी ईमानदारी और स्पष्ट वादिता के साथ अपने विचार व्यक्त कर सकती है अपनी इच्छाओं के दमन करने में अब उनका विश्वास नहीं है।
सांस्कृतिक चेतना का प्रभाव व्यक्ति पर पडता है। रेडियों टी०वी० चैनल, समाचार पत्र, मीडिया, और इनमें छपने, प्रसारित, प्रकाशित होने वाली सामग्री का गहरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव पडता है। पारिवारिक सहभूमिका का भी प्रभाव विवाह पर पड़ता है। संयुक्त परिवार में और एकल परिवार में रहने वाली संतान के व्यवहार और विचार में अन्तर आता है। सामाजिक परिवर्तन भी अलग अलग हो सकते है।
शहरी पृष्ठभूमि और ग्रामीण पृष्ठभूमि का भी प्रभाव बहुत हद तक देखने को मिलता है। जिसमें टी वी सीरियलों का भी प्रभाव इनदिनों काफी देखने को मिलता है। वेशभूषा के प्रभाव से भी इन्कार नहीं किया जा सकता हैं प्रेम में पागल नई पीढी वेशभूषा टी वी सीरियलों और फिल्मों के आधार पर तय हो रही है। और इसका प्रभाव प्रेम सम्बन्धों और प्रसंगों पर निश्चित रूप से पडता है।
प्रेम सम्बन्धों पर औधोगिकरण नगरीकरण लोकतंत्र अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता धर्म के घटते प्रभाव का भी असर पड़ रहा है। रूढिवादिता कम हुई है। प्रयोगशीलता तथा प्रगतिशीलता बढी है। इस कारण प्रेम की अभिव्यक्ति में एक खुलापन आया है। जो प्रेम के विभिन्न रूपों में अभिव्यक्त कर सकता है। प्रसंग उनमें से एक महत्वपूर्ण रूप है।
(क्रमश:)
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