यशवन्त कोठारी, जयपुर
प्रसंग शक्ति व्यक्ति को अनेक तरह से प्रभावित ओर प्रेरित करती है। वह व्यक्ति के सोचने के ढंग को प्रभावित करती है। वह उसे कभी निराश उदास कर देती है तो कभी उल्लास व जीवन से परिपूर्ण प्रेम जीवन को गहराई ओर समृद्धि प्रदान करता है सहिष्णुता बढ़ाता है। और हमारे संवेंगों को व्यापक बनाता है तुष्टि कोई चाय काफि पीने की तरह नहींे है।
आधुनिक जीवन में प्रसंग के कारण अभद्रता बढ़ी है। प्रेम के बिना प्रसंग का कोई मूल्य नहीं हैं यह एक सशक्त सत्य हैं जो मनुष्य को बांधे रखता है प्रसंग का दमन विक्षिप्त करता है। यह तात्कालिक आवश्यकता नही है। यह सोच गजब है कि प्रसंग एक बुरी वस्तु है। मानसिक विकार उत्पन्न करता है। मनुष्य मेमेंलिया जन्तु है जिसके करेकटर्स में पोलीगेमी निश्चित रही है इस सहज प्रवृति को दबाने से स्नायविक अस्थिरता उत्पन्न होती है। एक रिक्तता आती है। जो सम्बन्धों को कमजोर बनाती है।
प्रसंग किसी भी प्रकार से लज्जाजनक नहीं। हिन्दू संस्कृति प्रसंग को पवित्र मानता हैं स्त्री एक नदी की तरह सदा नीरा सदा पवित्र मानी गई हैं। काम की मूल कल्पना ज्ञानेन्द्रियां है संयम का पालन करने से प्रसंग कलह बन जाती है और इसका सफल और संतोषप्रद क्रियान्वयन आवश्यक है। व्यक्ति केा समझ विकसित करनी पडती है।
सत्य है कि प्रसंग मानव जीवन का सबसे सशक्त और उपयोगी उपादान के रूप में हर वक्त उपस्थित रहा है। और उपस्थित रहेगा। यह स्त्री को पुरूषों के अन्दर और पुरूषों को स्त्रियां के अन्दर श्रेष्ठ गुणों को उत्पन्न करने में सक्षम है। प्रसंग के अति विचित्र संस्कृति में जो अन्तर पाये जाते है वे बहुत व्यापक है और इन्हें समझना बहुत जटिल है। भारतीय संस्कृति के संदर्भ में भी इस जटिलता को समझना प्रदेशां की स्थिति के आधार पर निर्भर करता है।
एक ही समाज, जाति संस्कृति या जनपद में भी यह अलग अलग हो सकती है सर्वत्र एक अनिवार्य शारिरिक आवश्यकता बनकर सामने आया है जीवन का एक आवश्यक अंग बन गया है प्रसंग जिसमें की वर्षो में इस क्षेत्र में विचारों में परिवर्तन आये है खासकर महिलाओं के सोच में आये परिवर्तन पूर्ण रूप से नये है और अब यह लज्जाजनक, गंदा नहीं होकर एक पवित्र आवश्यकता बनकर सामने आया है।
(क्रमश:)
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