यशवन्त कोठारी, जयपुर
प्रेम के बारें में हम क्या जानते है ? प्रेम एक महत्वपूर्ण भावनात्मक घटना हैं। प्रेम को वैज्ञानिक अध्ययन से अलग समझा जाता हैं। कोई भी शब्द इतना नहीं पढ़ा जाता है, जितना प्रेम, प्यार, मुहब्बत। हम नहीं जानते कि हम प्रेम कैसे करते है। क्यों करते है। प्रेम एक जटिल विषय है। जिसने मनुष्य को आदि काल से प्रभावित किया है।
प्रेम और प्रेम प्रसंग मनुष्य कि चिरस्थायी पहेली है। प्रेम जो गली मोहल्लों से लगाकर समाज में तथा गलियों में गूंजता रहता है। प्रेम के स्वरूप और वास्तविक अर्थ के बारें में उलझनें ही उलझनें है। प्रेम मूलतः अज्ञात और अज्ञेय है। प्रेम का यह स्वरूप मानव की समझ से दूर हैै। प्रेम के बारें में कोंई जानकारी नहीं हो पाती है प्रेम पर उपलब्ध सामग्री कथात्मक, मानवतावादी तथा साहित्यिक है या अश्लील है या कामुक है और प्रेम का वर्णन एक आवेशपूर्ण अनुभव के रूप में किया जाता है अधिकांश साहित्य प्रेम कैसे करें? का निरूपण करता है। प्रेम के गंभीर सामाजिक और मनोवैज्ञानिक अध्ययन के प्रयास देर से शुरू हुए।
प्रेम एक आदर्शीकृत आवेश है जो काम की विफलता से विकसित होता है। या फिर काम के बाद प्रेम विकसित होता है। परन्तु काम प्रेम से अलग भी प्रेम होता है प्रेम को शुद्धतः आत्मिक चरित्र भी माना गया है। प्रेम और काम की अलग अलग व्याख्याएं संभव है। परिभाषाएं संभव हंे प्रेम एक जटिल मनोग्रन्थि हे। प्रेम एक संकल्प हैं। जिसके अर्थ अलग अलग व्यक्तियों कि लिए अलग अलग हो सकता है। यदि प्रेम का समनवय शरीर से है तो उद्दीपन ही काम जनित प्रेम है, यदि ऐसा नहीं है तो यह एक असंगत प्रेम है।
प्रेम संवेगों का उदगम क्या है? प्रेम भावना क्या है? व्यक्ति के उदगम अलग अलग क्यों होतें है। देहिक ओर रूहानी प्रेम क्या है? प्रेम का प्रारम्भ कहां से होता है और अंत कहां पर होता है। प्रेम में पुरस्कार स्वरूप माथे पर एक चुम्बन दिया जाना काफी होता था, मगर धीरे धीरे शारिरिक किस को महत्व दिया जाने लगा ओर सम्बन्ध बनने लग गये। प्रत्येक मनुष्य में जन्म के समय से ही प्रेम का गुण होता है तथा प्रेम की क्षमता होती है।
प्रेम वास्तव में मनुष्य का वह फोकस है जो काम से कुछ अधिक प्राप्त करना चाहता है। जब किसी के लिए दूसरे की तुष्टि अथवा सुरक्षा उतनी महत्वपूर्ण बन जाती हैं। जितनी स्वयं की तो प्रेम अस्तित्व में आता है। प्रेम का अर्थ अधिकार नहीं समर्पण और पूर्णरूप से स्वीकार करना होता है। दो मनुष्योें के बीच आत्मीयता की अभिव्यक्ति ही प्रेम है। प्रेम से अभिप्राय उस अतः प्रेरणा के संवेगों से होता है जो व्यक्ति के साथ व्यक्तिगत संपर्क से प्राप्त होती है। रोमांटिक प्रेम वास्तव में सामान्य प्रेम की गहन अभिव्यक्ति होता है। जिसमें एन्द्रिय तथा रोमांटिक प्रेम का अस्तित्व हमेशा से ही रहता है।
प्रेम के चार मुख्य घटक संभव है परमार्थ प्रेम, सहचरी प्रेम, काम प्रेम, और रोमांटिक प्रेम।
प्रेम उभयमानी होता है वास्तव में प्रेम घनात्मक एवं ़़ऋणात्मक धु्रर्वो की तरह ही होता हैं एक ही मन उर्जा के दो विपरीत घुर्वो की तरह है।
(क्रमश:)
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