रचनाकार : नीलिमा तैलंग, पन्ना (मध्य प्रदेश)
शिखा का मन आज ट्रेन की गति से भी अधिक भाग रहा था ।वह बार बार कलाई पर बंधी हुई घड़ी को देख रही थी । कान में लगा कर बार बार घड़ी के सही चलने की शंका का निवारण कर लेती थी ।उसको लग रहा था कि काश आज उसके पास पंख
होते …।
शादी के पूरे दो वर्ष बाद आज वह अपने मायके लखनऊ जा रही थी ।शादी के तुरंत बाद उसके पति सुबोध को विदेश में एक अच्छी सी जॉब मिल गई थी।वहां जाकर पति की व्यस्तताओं के चलते दो वर्ष तक उसका अपने देश लौटना संभव न हो पाया था।अभी परसों ही वह अपने पति सुबोध के साथ अपने देश वापिस लौटी थी ।
उसको अपनी मम्मी से मिलने की जितनी तीव्र इच्छा थी और उससे भी कहीं अधिक मिलने की इच्छा अपने पड़ोस में रहने वाली जमना काकी से थी ।
शिखा का बचपन जमना काकी की गोद में ही हंसते खेलते बीता था ।जमना काकी बड़े ही प्यार से उसे अपनी गोद में उठा कर अपने घर ले जाया करती थीं ।घर ले जाकर उसे अच्छी तरह नहला धुला कर उसके बालों में ढेर सारा तेल चुपड़ कर छोटी छोटी दो चोटी बना दिया करती थीं । उसके लिए बड़े ही प्यार से दलिया बनातीं और ताजे ताजे गाय के दूध में डाल कर बड़े ही प्यार से खिलाया करती थीं। उसे बाजार से उसके मनपसंद खिलौने और कपड़े भी दिलाया करती थीं ।
जब जमना काकी उसे उसकी मम्मी के पास छोड़ने जाती तो मम्मी बनावटी क्रोध दिखाते हुए जमना काकी से कहतीं,”दीदी आप क्यों इसके लिए इतना सब करती हैं”!
और जमना काकी यह कह कि क्या शिखा पर मेरा कोई अधिकार नहीं है?मम्मी का मुंह बंद कर दिया करती थीं ।
इस प्रकार शिखा अपने घर में कम और जमना काकी के पास रह कर अपना बचपन बिताने लगी।
जमना काकी अधिकतर काले रंग की साड़ी पहना करती थीं जो उनके गोरे रंग पर बड़ी ही सुंदर लगा करती थी ।शिखा कई बार उनसे उनकी काले रंग की साड़ी खुद को पहनाने की जिद किया करती और जमना काकी उसे बड़े प्यार से अपनी काले रंग की साड़ी यह कहते हुए पहना दिया करती कि तेरी शादी में जरी से जड़ी हुई काले रंग की साड़ी दहेज में दूंगी।
जब शिखा सात वर्ष की थी तो उसके पापा का ट्रांसफर मुंबई हो गया ।और इस प्रकार उसका और जमना काकी साथ छूट गया ।शिखा को जमना काकी के बारे में बस इतना मालूम था कि उनके पति जानकी बाबू भी काकी को छोड़कर इस दुनिया से कूच कर गए थे।
्क्रमश:
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बहुत सुंदर