रचनाकार : शबनम मेहरोत्रा, कानपुर
चाहत
उम्रभर के लिये प्रेम का दर्द ठहर गया
ज़ख़्म ये नासूर बन दिल में समा गया
दिल धक धक धड़कता है सॉंस चलती है
याद आती है तेरी ,चाहत फिर तड़पती है
दूर बहुत दूर रहकर भी पास नजर आते हो
याद प्रेमपाश आलिंगनबध्द नजर आते हो
ग़म का ख़ुश्क दरिया है कश्तियाँ भी ख़ामोश
ख़ुशी के पल नैनों से करते अश्क़ों कि बारिश
मेघों में सागर में तेरी आकृति नजर आती है
पंछी लाये हैं कोई संदेश या मात्र छलावा है
तन्हा हूँ उदास नहीं मंज़िल की तलाश नहीं
फिर तेरे पसीने कि ख़ुश्बू सूँघना चाहती हूँ
प्रियतम मैं विक्षिप्त खोजती अपना अस्तित्व
अगले जन्म प्रिय तुम्हें फिर पाना चाहती हूँ
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हल्के हल्के
नींद में जब रहूँ मैं जगी हल्के हल्के
बिखरी जुल्फों को यूँ हटा हल्के हल्के
सोया घर ये जगे ना बस रखना ख़्याल
पास आना हो मेरे तो आ हल्के हल्के
वैसे नयनों की भाषा भी पढ़ लेती हूँ मैं
बोलना ही अगर है बता हल्के हल्के
कुछ दिखाने की चाहत है दिल में तुम्हारे
वो नजारा भी मुझको दिखा हल्के हल्के
शायरी की बारीकी मैं कुछ भी न जानूँ
अब शबनम को थोड़ी बता हल्के हल्के
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आँधी
दीप आँधी में तुम जलाते रहो
हौसला ऑंधियों का गिराते रहो
कितनी शिद्दत से चाहा मैंने तुम्हें
मेरी चाहत की हंसी उड़ाते रहो
दिल हमारा जले यही सोच कर
गैर को अपने घर में बुलाते रहो
मुंतज़िर मेरा दिल तो पहले से था
मेरे दिल पर ठोकर लगाते रहो
अब दोबारा न शायद मिल पाएँगे
पर शबनम के सपने में आते रहो
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मुहब्बत
नफरत नही न मुहब्बत है तुमसे
लगावट नही न ही चाहत है तुमसे
तेरे आने से पहले जगते थे अरमाँ
कहाँ दिल को मेरे राहत है तुमसे
देव समझ तुझको पूजा था पहले
कोई अब न पूजा इबादत है तुमसे
दिल न दुखाया न की है ठिठोली
नही दुश्मनी या न उल्फत है तुमसे
शबनम मुझे बेवफा कह दिए तुम
हुई है क्या मेरी ये हालत है तुमसे