रचनाकार : दिविक रमेश, नोएडा
यही कारण है कि मैं सामाजिक कही जा सकने वाली रचनाएँ अधिक कर सका और बावजूद सहज किशोर या युवा आकर्षणों के जैसी कविताएँ बहुत कम लिख सका जिन्हें कोमल भावों की कविताएँ कह सकते हैं।
यूँ भी, आकर्षण-सम्बद्ध दुविधा की स्थिति से उबर कर किसी निर्णयात्मक स्थिति में न पहुँचने के कारण सृजन की प्रेरणा तो बने होंगे लेकिन स्पष्ट अभिव्यक्ति के नहीं। हाँ, जब मेरा सम्पर्क मेरी पत्नी से हुआ – एक प्रेमिका के रूप में – तब प्रेम के दौरान के खट्टे-मीठे अनुभवों ने ज़रूर रचनाएँ लिखवा ली लेकिन तब भी प्रेम कविताएँ कम ही लिखीं। कदाचित इसीलिए अपनी प्रेमिका-पत्नी को सम्बोधित एक कविता में मुझे लिखना पड़ा था –
तुम इसीलिए रूठी हो न
कि तुमसे प्यार लेकर भी
मैंने कोई प्रेम कविता नहीं लिखी?
अब सोचता हूँ तो प्रेम-कविता न लिख पाने का कारण घर-परिवार के वे संस्कार रहे जो एक आयु के बाद लड़के-लड़की के बीच बात करना भी उचित नहीं मानते थे। यह बात अलग है कि मेरा मन भीतर ही भीतर वैसे संस्कारों के प्रति विद्रोही बन रहा था। शायद मेरा प्रेम-विवाह भी उसी विद्रोह का प्रतिफल कहा जा सकता है। मेरे पहले संग्रह की कविताएँ अधिकतर मेरे विरोधी मन की ही अभिव्यक्तियाँ हैं जिनमें नकार का स्वर प्रमुख है। गाँव से आने के बाद शहर से जो संघर्ष करना पड़ा उसकी भी अभिव्यक्तियाँ वहाँ मौजूद हैं। जो, अपनी निष्ठा के बावजूद नहीं मिल सका, उसको लेकर अपने आपको समझाने से सम्बद्ध अभिव्यक्तियाँ हैं। बँधे संस्कारों ने एक फ़ायदा ज़रूर पहुँचाया। उन्होंने मुझे भाषा के उस स्वरूप से बचाया जो अकविता के कितने ही कवियों को उस समय प्रिय था, और वह फैशन में भी था। मैं वैसे शब्द नहीं लिख सकता था।
एम.ए. के विद्यार्थी के रूप में ही मेरी एक कविता किसी साधारण सी पत्रिका में छपी थी। लेकिन वास्तव में मैं अपनी पहली प्रकाशित कविता मणिमय (कलकत्ता) में, 1970 में प्रकाशित ‘एक सूत्र’ को मानता हूँ। यह कविता विमल जी के द्वारा सुधारी गई थी और शायद उन्हीं के कहने पर उक्त पत्रिका को भेजी थी। कविता का छपना मेरे लिए काफी प्रेरणादायी सिद्ध हुआ।
दिल्ली विश्वविद्यालय के कॉलिज में मुझे 1970 में ही प्राध्यापक के पद पर नौकरी मिल गई थी। एम.ए. मैं 1969 में ही कर चुका था – प्रथम श्रेणी में। संस्थान में प्रथम भी आया था। लेकिन पूरा साल नौकरी के संघर्ष में बेचैन रहा। हीन भावना भी जागृत हुई।
आकाशवाणी के युववाणी कार्यक्रम से भी वास्ता हो चला था। मेरे कुछ सहपाठी अच्छी पत्रिकाओं में छपने लगे थे। मेरी रचनाएँ प्रायः लौट आती थीं। नौकरी के प्रारम्भिक कुछ वर्षों में मेरी साहित्यिक गतिविधियाँ बढ़ चली थीं। संकोची स्वभाव अब पीछे छूट रहा था। दिल्ली पब्लिक पुस्तकालय के साहित्यिक कार्यक्रमों में भाग लेना ज़ारी था जहाँ रमेश गौड़ और दूसरे कवियों को सुनने का मौका रहता। मुझे अंग्रेजी के रोमेंटिक कवियों ने बहुत प्रभावित किया था, खासकर उनके प्रकृति-प्रेम ने। अतः मैंने एक दिन पाया कि मैं प्रकृति के संदर्भ में सर्वाधिक रचनाशील होता हूँ। वही मेरी रचना का उत्स है। लेकिन बिना मानवीय ताप के मुझे निरा प्रकृति-संसर्ग कभी नहीं भाया। मानवीय ताप में भी दुःख-दर्द और संघर्ष वाला हिस्सा। मुझे कमरे की खिडकी के पास बैठना अच्छा लगता। खिड़की के बाहर जो कुछ दीखता वह धीरे-धीरे कब ओझल होकर मेरे लिए कविता की राह खोल देता मुझे पता ही नहीं चलता। कभी कोई शब्द दिमाग में आता और तब तक अटका ही रहता जब तक कोई कविता नहीं लिखवा लेता ठीक वैसे ही जैसे कुछ चरित्र कहानी लिखवा कर ही मुक्त करते हैं।
क्रमश:
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Divik ji aap naye lekhakon ko qa salaah denge Jo khud apni rachnayein prakashit karwana chahte ho?