रचनाकार: पंकज शर्मा “तरुण “, मंदसौर (म. प्र.)
ऋतुराज
पतझड़ दुख सम भागता,सुन आया ऋतुराज।
सुन कर इस संदेश को, झंकृत मन के साज।।
झूम उठे मधुकर तरुण, गुन- गुन गाते गीत।
कलियों पर मंडरा रहे, बन जाने को मीत।।
आत्मा का बल हो कवच, मिलती निश्चित जीत।
खुद से अच्छा है कहाँ, कोई अपना मीत।।
सरिता को अपशिष्ट से,करें न मैली तात।
जीवन रेखा है रखें, सुखदाई अनुपात।।
निज स्वभाव ऐसा रखें, जैसे होता सूप।
मन भावन सबको लगें,ज्यों सर्दी की धूप।।
बदली- बदली है पवन, हुई तेज भी धूप।
सूरज धरती के निकट,आकर बदले रूप।।
भंवर लाल नेता हुए, पाते बहु सम्मान।
मगर नहीं यह जानते, कैसे बना विधान।।
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घूंघट
नित रिश्ते, घूंघट पट खोले।
राम नाम नित सांसें बोले।।
ब्रह्म नाद जब बजती प्यारी।
कानों में ज्यों मिश्री घोले।।
नैनों में जब सूरज निकले।
हो उजियारा होले होले।।
शांत हो रहा है अंतर्मन।
जो दर्शन के धधके शोले।।
धूनी सतत जले नित अंदर।
चाहे मत पहनो तुम चोले।।
बोलो बजा बजा कर डमरू।
बम बम भोले बम बम भोले।।
लगा त्रिवेणी में चल डुबकी।
पाप किए जो सारे धोले।।
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दिल की बस्ती
मेरे दिल की बस्ती को तुम,
प्रियवर पुनः सजाओ।
सूने मन के इस आंगन में,
शहनाई बजवाओ।।
काल सर्प डसने को आतुर,
हर पल मुझे डराता।
बीन बजाओ खुशियों की तुम,
इसे तुरंत भगाओ।।
तमस निराशा के घेरे हैं,
हर पल मुझे डराते।
प्रियवर विनती सुन लो मेरी,
आशा दीप जलाओ।।
तुम ही मेरे मीत सजन जी,
जग में सबसे प्यारे।
आओ अब देरी मत करना ,
बैठी घर के द्वारे।।
जज्बातों के इस गुलशन में,
पारिजात लगवाओ।
मन के सूने इस मरुथल में,
नखलिस्तान बना दो।।
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सावधान
दूषित विश्वासों का सागर अब,
ठाठें मार चिढ़ाता पल- पल।
भस्म हुई श्रद्धा हर घर में,
हुई अजब सी देखो हलचल।।
सींच रहा था जिस बेला को,
ज्ञात नहीं जकड़ेगी मुझको।
अब बच पाना सहज नहीं है,
क्यों लगता है मुझको दल- दल।।
मध्य दिवस सम तपता सूरज,
सोंख रहा मेरे तन से जल।
सूख रही है नेह सरित भी,
जो बहती थी मुझमें कल कल।।
भटक रहा राहें जीवन की,
होते जाते तमस घनेरे।
रूप भयंकर लगता अब तो,
लगें पराए थे जो मेरे।।
बैर मधुर खट्टे होते हैं,
पर आंगन में नहीं लगाना।
कंटक भी है इसमें देखो,
कभी इन्हें तुम भूल न जाना।।
यही बैर जब तुम तोड़ोगे,
हाथों को घायल कर देंगे।
तन मन की संचित पूंजी को,
पल भर में सारी हर लेंगे।।
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बहुत सुंदर रचना